तू अपनी बात कर वाइज़, ख़ुदा की बात रहने दे,
ख़ुदा को जानते हैं हम, ख़ुदा है जानता हमको.
न है वो दोस्त न दुश्मन, न हमसे आशनाई है,
बुरा कहता है हमको क्यूँ, नहीं जो जानता हमको?
ज़रा-सी बात पे हमसे ज़माना रूठ जाता है,
हमेशा साथ रहता जो है सचमुच जानता हमको.
है ऐसा आईने में कौन जो हम पे यूँ हँसता है?
है कोई और जो हमसे भी बेहतर जानता हमको?
~ देवांग परीख 'रसिक'
[ वाइज़ = धर्म का उपदेशक, आशनाई = जान पहचान ]